मुंशी प्रेमचंद कहानियों और उपन्यास को जमकर बेचा, लेकिन नहीं हुआ न्याय

मनोरंजन राज्य

लखनऊ: महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास और कहानियों पर कई फिल्मों के निर्माण के बाद हिन्दी सिनेमा उनकी प्रतिभा का सही दीदार दर्शकों को नहीं करा सका। प्रेमचंद के उपन्यास और कहानियों पर कई फिल्में बनी लेकिन उन्हें सफलता नहीं नसीब हो सकी। वह खुद अपनी किस्मत आजमाने बम्बई मुम्बई 1934 में गए। अजंता सिनेटोन कंपनी में कहानी लेखक की नौकरी भी की।

उन्होंने ‘मिल मजदूर’ फिल्म की पटकथा लिखी। मोहन भगनानी के निर्देशन में बनी इस फिल्म को सफलता नसीब नहीं हो सकी। फिल्मी दुनिया का हवा पानी उन्हें रास नहीं आया।

1934 में फिल्म ‘नवजीवन’ बनी। एआर कारदार ने 1941 में त्रिया चरित्र पर फिल्म ‘स्वामी’ बनाई जो नहीं चली। 1946 में ‘रंगभूमि’ पर इसी नाम से फिल्म बनी।

मृणाल सेन ने 1977 में कहानी कफन पर बांग्ला में ‘ओका ऊरी कथा‘ बनाई।

साल 1963 में ‘गोदान’ तथा 1966 में ‘गबन’ का निर्माण हुआ।

दूरदर्शन ने उनके उपन्यास निर्मला पर इसी नाम से धारावाहिक का निर्माण किया।

प्रेमचंद देश ही नहीं दुनिया में भी मशहूर हुए। उन्होंने साहित्य में यथार्थवादी परम्परा की नींव रखी। के सुब्रमण्यम ने 1938 में ‘सेवासदन’ उपन्यास पर इसी नाम से फिल्म बनायी जिसमें सुब्बा लक्ष्मी ने मुख्य भूमिका अदा की थी।

‘शतरंज के खिलाड़ी’ के रूप में सफलता का मुंह देखा। निर्देशक सत्यजित रे ने 1977 में इसका निर्माण किया था।

शतरंज के खिलाड़ी को तीन ‘फिल्मफेयर’ के अलावा 1978 में बर्लिन महोत्सव में ‘गोल्डन बीयर’ अवार्ड मिला।

रे ने 1981 में ‘सदगति’ का निर्माण किया।

 

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